Visual Verse
Snapshots that capture Meena's poetic soul.


और कितनी बार
By Meena Chauhan


तोड़ेंगी निराशायें हृदय और कितनी बार
सतायेंगी वेदनायें मन को और कितनी बार
टूटे मन दर्पण को अब कैसे समझाऊँ
निराश भावनाओं को कैसे धैर्य बँधाऊँ
आशाएं बिखर गईं उर की
कहाँ से ला प्रकाश मैं दीप और जलाऊँ
ढकेगा ये अँधेरा चित्त को और कितनी बार
टुकड़े हुई उमंगों को कौन अब समेटे
सुकुमार बगिया में हर राह भटके
जीवन के आँचल में कांटे ही कांटे
कंटीले दामन को ही खुद से लपेटे
सकेगा नैन उपवन और कितनी बार
असँख्य बन्धन और अनंत पीड़ायें
बंध गये तन पर मन सह न पाये
कितनी की कोशिश और कितने प्रयास
की किसी तरह ये जीवन उन्मुक्त हो जाये
पर अवसाद का ये बन्धन बंधेगा और और कितनी बार
कांच का ये मन दर्पण बार-बार टुटा
कच्चा रंग कल्पनाओं का बार-बार छूटा
नैनों से नैनो तक आंसू ही आंसू
जीवन से सुख चंचल हर बार रूठा
सिमटेगा निषाद सागर और कितनी बार
पंख होते तन पर पंछी साथ उड़ जाते
नीरव आकाश में विचरते-मदमाते
किन्तु स्व निल स्वप्निनिल पंख तो झंझवातों से घिर जाते
वरना दुख सागर से पार उतर जाते
चटखेगा जीवन-कंचन और कितनी बार
Morning inspiration.
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